दीपावली और धनतेरस का पावन पर्व केवल दीप जलाने का उत्सव नहीं, बल्कि अपने जीवन से नकारात्मकता मिटाकर नई ऊर्जा के स्वागत का अवसर है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार शुभ काल में की गई साधना व्यक्ति के जीवन में अनुशासन और समृद्धि लाती है। सही मुहूर्त और सरल नियमों को समझकर पूजन करने से घर में शांति और बरकत बनी रहती है।
धनतेरस के दिन भगवान धन्वंतरि और कुबेर देव की पूजा का विशेष विधान है। इस दिन केवल धातु खरीदना ही उद्देश्य नहीं होना चाहिए, बल्कि परिवार के स्वास्थ्य की प्रार्थना करना मुख्य ध्येय होता है। संध्या काल में यम दीपदान करने से घर के सभी भय दूर होते हैं। इस अवसर पर उत्तर दिशा को साफ-सुथरा रखकर पूजा करने से मानसिक शांति और व्यापार में संतुलन प्राप्त होता है।
दीपावली पूजन में स्थिर लग्न का विशेष विचार किया जाता है। ज्योतिष में स्थिर लग्न का अर्थ उस अवधि से है जिसमें ग्रहों की ऊर्जा स्थिरता का संकेत देती है। वृषभ या सिंह लग्न के दौरान महालक्ष्मी का आह्वान करने से आय और धन-संपत्ति में ठहराव आता है। सूर्यास्त के बाद का प्रदोष काल गृहस्थों की पूजा के लिए सर्वोत्तम माना गया है, जिसमें मन की एकाग्रता से ईश्वरीय कृपा सहज हो जाती है।
महालक्ष्मी की साधना में आडंबर से अधिक भाव की प्रधानता होती है। मिट्टी के दीपक, गाय का शुद्ध घी और रोली-चावल से की गई सात्विक पूजा मन को हल्का करती है। श्रीसूक्त अथवा कनकधारा स्तोत्र का धीमे स्वर में पाठ करने से घर का वातावरण सकारात्मक बनता है। याद रखें कि ग्रह केवल समय का मौसम बताते हैं, आपकी श्रद्धा और कर्म ही आपके जीवन की वास्तविक दिशा तय करते हैं।
धनतेरस से दीपावली तक प्रतिदिन सायंकाल घर के मुख्य द्वार पर घी का चौमुखा दीपक रखें और उत्तर दिशा में स्वच्छ जल से भरा पात्र स्थापित करें।