कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को रमा एकादशी कहा जाता है। दीपावली से ठीक पहले आने के कारण इस एकादशी का आध्यात्मिक और धार्मिक महत्व अत्यधिक बढ़ जाता है। इस दिन भगवान विष्णु के साथ माता लक्ष्मी के 'रमा' स्वरूप की आराधना की जाती है, जिससे जीवन में सकारात्मकता और शांति का संचार होता है।
पंचांग की सटीक गणना के अनुसार, रमा एकादशी का व्रत 5 नवंबर 2026 को रखा जाएगा। एकादशी व्रत का पूर्ण फल तभी प्राप्त होता है जब उसका पारण शास्त्रोक्त समय पर किया जाए। व्रत का पारण अगले दिन यानी 6 नवंबर को द्वादशी तिथि समाप्त होने से पूर्व और सूर्योदय के उपरांत किया जाता है। पारण के समय सात्विक भोजन, विशेषकर तुलसी दल या मीठे फल से व्रत खोलना उत्तम माना गया है। शास्त्रों के अनुसार, हरिवासर समाप्त होने के बाद ही पारण करना श्रेयस्कर होता है।
वैदिक ज्योतिष में एकादशी को मन और इंद्रियों के नियंत्रण का दिन माना गया है। इस दिन चंद्रमा की स्थिति हमारे जल तत्व और विचारों को प्रभावित करती है, इसलिए उपवास रखने से मानसिक शांति मिलती है। रमा माता लक्ष्मी का ही एक नाम है, अतः यह तिथि आर्थिक चिंताओं को कम करने और घर में सौहार्द बढ़ाने के लिए अत्यंत शुभ मानी जाती है। जो साधक इस दिन नियमित दिनचर्या और संयम का पालन करते हैं, उन्हें आत्मबल की प्राप्ति होती है।
एकादशी के दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नानादि से निवृत्त होकर पीले वस्त्र धारण करें। पूजा स्थल पर भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की प्रतिमा स्थापित कर उन्हें पीले पुष्प, फल, धूप और दीप अर्पित करें। भोग में तुलसी पत्र अवश्य शामिल करें। इस दिन चावल और तामसिक भोजन का पूर्ण त्याग करना चाहिए। वाणी पर संयम रखें और किसी के प्रति दुर्भावना न लाएं। पूरा दिन भगवद् भजन और 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' मंत्र के मानसिक जप में व्यतीत करना चाहिए।
शाम के समय तुलसी के पौधे के समीप गाय के शुद्ध घी का दीपक प्रज्वलित करें और विष्णु सहस्त्रनाम या 'ॐ विष्णवे नमः' का शांत मन से ग्यारह बार जप करें।